मूलाधार चक्र को जाग्रत करें नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की आराधना सें - योग गुरु पंकज शर्मा

मूलाधार चक्र को जाग्रत करें नवरात्रि के प्रथम दिन माता शैलपुत्री की आराधना सें - योग गुरु पंकज शर्मा

माता शैलपुत्री : नवरात्रि के प्रथम दिन यानी प्रतिपदा के दिन इनका पूजन-जप किया जाता है। और अगर मनुष्य मूलाधार में ध्यान कर इनके मंत्र को जपता हैं। तो उसको धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है और इस दिन अगर हम अपने मूलाधार चक्र को जाग्रत करने का प्रयास करे तो हमे काफी जल्दी सफलता प्राप्त होगी ।

सप्त चक्रों के क्रम मे मूलाधार पहला चक्र है, यह चक्र ज्ञानेन्द्रियों और गुदा के मध्य स्थित होता है। इस चक्र का रंग लाल होता है और इसकी आकृति 4 पंखुड़ियों वाले कमल के समान होती है। ये चार पंखुड़ियां काम, वासना, लालसा और सनक की प्रवृत्ति को दर्शाती हैं। मूलाधार चक्र जागृत होने पर कामवासना, मानसिक स्थिरता, भावनात्मक रूप से इंद्रियों को नियंत्रित करने लगती हैं। इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। व्यक्ति की आर्थिक स्थिति मे सुधार होता है तथा उसकी समाजिक असुरक्षा दूर होती है । अगर बात करें प्रोफेशनल जिंदगी की तो मूलाधार चक्र के जाग्रत होने के बाद मनुष्य के अंदर  टीम वर्क और टीम भावना के साथ काम करते हुए सबको साथ ले कर चलने की और मिलजुलकर के काम करने की प्रवृत्ति आएगी और मन सब तरह के काम में लगेगा। व्यक्ति के शरीर का मध्य भाग व इसके अंग गुप्तांग, गुर्दे, लिवर आदि का स्वास्थ्य उतम रहता है । ऊर्जा की प्रबलता बनी रहती है तथा मूलाधार से आगे के चक्रों मे बढने मे सुविधा हो जाती है । इस चक्र के जागृत होने से भगवान गणेश जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है ।

जब यह चक्र निष्क्रिय होता है या ठीक से काम नही करता तब मनुष्य  जानवर के समान हो जाता है वो सिर्फ काम प्रधान हो जाता है और उसको सिर्फ शारीरक सुख चाहिए होते है और वो पूर्ण रूप से स्वार्थी बन जाता है उसका किसी भी कार्य मे मन नही लगता वो जीवन भर सिर्फ सपने देखता है विचारों और काल्पनिक दुनिया मे जीता रहता है

आध्यात्मिक कार्यों से उसका कोई सरोकार नही रहता वो सिर्फ वासना और कभी समाप्त न होने वाली इच्छाओं के पीछे पूरे जीवन भर भागता रहता है 


मूलाधार जागृति के लिये निम्न बाते बहुत जरुरी है :-

जब तक इंसान इस चक्र में है तब तक वह पशु सामान है  इसलिए खुद पर संयम रखें और इस चक्र से बाहर निकलने की कोशिश करें। मूलाधार चक्र का रंग लाल है अतः लाल रंग की वस्तुओं को अपने समीप रखना , पहनना व लाल रंग के खाने पीने के पदार्थों का उपभोग करना उतम है, जैसे खाने में टमाटर , गाजर ,लाल मिर्च ,चेरी ,सेब आदि जैसे लाल रंग के खाद्य प्रदार्थ लेने चाहिए । इसके इलावा कुछ ऐसे व्यायाम करना जिससे हमारे शरीर के मध्य भाग मे जोर पडे जैसे उठक-बैठक, दौडना, टहलना आदि लाभदायक है । कुछ योग आसन जैसे  स्वाष्तिकासन, पश्चिमोत्तानासन  भुजंगासन , धनुरसन, चक्र आसन, कुर्सी आसन आदि भी मूलाधार जागृति करते है, ताड़न क्रिया, अश्वनी मुद्रा भी बहुत प्रभावी है  ,कपालभाति, अग्निसार, भस्त्रिका आदि प्राणायाम भी मूलाधार मे जाग्रति लाते है । आसनों और प्राणायाम के बारे में अधिक जानकारी के लिए आप यूट्यूब पर योग गुरु पंकज शर्मा या चैनल का नाम शरणम सर्च कर सकते है | इसके अलावा आप भोगविलास, निद्रा और संभोग पर काबू रखकर इसे जागृत कर सकते हैं।

अगर बात करे नवरात्रि में खास पूजा के द्वारा मूलाधार चक्र को जाग्रत करने की तो सबसे पहले जब भी आप ये साधना करें तो पहले अच्छे से नहा धो के नए या धुले हुए कपड़े पहन कर साफ से लाल आसान के ऊपर बैठ के भगवान गणेश जी का आवाहन करें क्योंकि  इस चक्र के देवता श्री गणेश है अतः इस चक्र पर ध्यान लगाते हुए भगवान गणेश जी के मंत्र ॐ गं गणपतये नम:  का जाप 108 बार यानी पूरी एक माला करनी चाहिए फिर उसके बाद  माता शैलपुत्री जो धन-धान्य-ऐश्वर्य, सौभाग्य-आरोग्य तथा मोक्ष के देने वाली माता मानी गई हैं। उन के मंत्र - 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।' का  11 बार माला का जाप करें ( यानी 108 × 11 ) और माला का जाप करते वक़्त मूलाधार में आपका ध्यान होना चाहिए ।


निम्नलिखित ध्यान से भी आप मूलाधार जागृति कर सकते है :

किसी भी ध्यानात्मक आसन में बैठ जाएं। अपने दोनों हाथों को ज्ञान मुद्रा में रखें तथा अपनी आंखों को बन्द करके रखें। अपनी गर्दन, पीठ व कमर को सीधा करके रखें। अब सबसे पहले अपने ध्यान को गुदा द्वार व जननेन्द्रिय के बीच स्थान मे मूलाधार चक्र पर ले जाएं। फिर मूलाधार चक्र पर अपने मन को एकाग्र व स्थिर करें और अपने मन में चार पंखुड़ियों वाले बन्द लाल रंग वाले कमल के फूल की कल्पना करें। फिर अपने मन को एकाग्र करते हुए उस फूल की पंखुड़ियों को एक-एक करके खुलते हुए कमल के फूल का अनुभव करें। इसकी कल्पना के साथ ही उस आनन्द का अनुभव करने की कोशिश करें। उसकी पंखुड़ियों तथा कमल के बीच परागों से ओत-प्रोत सुन्दर फूल की कल्पना करें। इस तरह कल्पना करते हुए तथा उसके आनन्द को महसूस करते हुए अपने मन को कुछ समय तक मूलाधार चक्र पर स्थिर रखें।

अथवा

शांत होकर, आँखे बंद करके, कमर को सीधा रखते हुए, ध्यानस्थ मुद्रा मे बैठ जाये, अब अपना पुरा ध्यान अपनी आती जाती श्वास पर लाये और जब भी श्वास अंदर आये तो " औम" और जब भी श्वास बाहर आये तो " लं " बीज मंत्र का मानसिक उचारण करे ।


विशेष :- अगले अंक में माता ब्रह्मचारिणी और स्वाधिष्ठान चक्र के बारे में

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